Author Topic: Hindi Poetry  (Read 10550 times)

sheemar

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Re: Hindi Poetry
« Reply #30 on: June 07, 2015, 11:53:01 AM »
 अर्ज़ किया है
हसीनों से फ़क़त साहब-सलामत दूर की अच्छी

न इनकी दोस्ती अच्छी, न इनकी दुश्मनी अच्छी

फ़क़त : सिर्फ़, साहब-सलामत : सलाम-दुआ

- हफ़ीज़ जौनपुरी



हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे

ये ज़िन्दगी तो कोई बद्दुआ लगे है मुझे

- जांनिसार अख़्तर



हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि

हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमां,

लेकिन फिर भी कम निकले

- ग़ालिब



हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है

रोने को नहीं कोई, हंसने को ज़माना है

- जिगर मुरादाबादी



हमने कांटों को भी नर्मी से छुआ है, अक्सर

लोग बे-दर्द हैं, फूलों को मसल देते हैं

- बिस्मिल सईदी



हमारे दम से ही आबाद हैं गली-कूचे

छतों पे हम ही कबूतर उड़ाने आते हैं

- रईस सिद्दीक़ी



हमारे पास तो ले-दे-के है, ये दर्द की दौलत

बड़े आराम से अपनी बसर-औक़ात होती है

बसर-औक़ात : ज़िन्दगी गुज़रना

- नूरजहां सर्वत



हमारे अहद के बच्चों को क्या हुआ, आख़िर

दरख़्त काट के साये तलाश करते हैं

अहद : समय, दरख़्त : पेड़

- रफ़ीक़ सौदागर



हमारे बच्चे बड़ों का अदब नहीं करते

न जाने कौन-सा जादू नए निसाब में है

निसाब : पाठ्यक्रम

- हसीब रहबर



हमारे देश में क्या ख़ूब होता है इलेक्शन

कि जिसके हाथ हों लंबे, उसी का है सिलेक्शन

- डॉक्टर राही फ़िदाई



हमसे सारी बस्ती वाले पूछ रहे हैं, देखा चांद

घर में फ़ाक़ा हो, तो भाई कैसी खुशियां, कैसा चांद

- सुहैल निज़ाम



हर इक मक़ाम से गुज़रूंगा ज़िन्दगी के लिए

तमाम रंज गवारा तेरी ख़ुशी के लिए

- फ़िदा ख़ालिदी



हर क़दम पर नित-नए सांचे में ढल जाते हैं लोग

देखते ही देखते कितने बदल जाते हैं लोग

- हिमायत अली शायर

sheemar

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Re: Hindi Poetry
« Reply #31 on: June 14, 2015, 12:52:53 PM »

anshika154

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Re: Hindi Poetry
« Reply #32 on: July 03, 2017, 05:29:27 PM »
यह दंभ 
पालते ही हैं हम कि
जीते हैं मर्यादित जीवन ।
 
रहते हैं मर्यादा में सदा ही 
पर यदि शांत मन से सोचें 
तो पाएंगे 
कितनी ही बार जीवन में
टूटी हैं हमसे मर्यादा ।
 
पहली बार तब तोड़ी थी 
मर्यादा 
जबजताई थी 
पिता के अनुभव से असहमति।
 
दूसरी बार तब टूटी थी
मर्यादा 
जब दिया था मां को जवाब।
 
फिर इश्क के नाम पर 
लगाए थे यहां-वहां चक्कर
की थी कभी छेड़छाड़ भी
और भी न जाने 
अपने हित के लिए 
कितनी ही बार तोड़ी होंगी
मर्यादा हमने।
 
पर क्या कभी 
इसे स्वीकारा भी है हमने! 
 
नहीं, 
यह अनकहा दंभ ही है 
जो रोकता रहा है हमको
अपने गिरेबां में झांकने से हरदम 
पर समय तो अपने आप को 
दोहराता ही है न। 

आज जब यही सब लौटता है
बच्चों के माध्यम से हम तक
तो फिर क्यों 
होते हैं विचलित ...?
खोते हैं क्यों अपना आपा ..?
 
जब हमने सीखा ही नहीं  
रहना मर्यादा में तो
कैसे रहेंगे बच्चे भी 
मर्यादा में ? 

जब-जब टूटेंगी मर्यादा
सीता होगी ही अपह्रत
होंगे ही फिर युद्ध भी 
मारा जाएगा दशानन भी।
 
इसलिए 
यदि रोकना है इन्हें तो
वक्त अभी भी है 
हम सबके पास
बड़े - बुजुर्गों के
अनुभव से सीखने और 
बच्चों को सिखाने का ।
 
मानना ही होगा हमें
उनके संस्कार, उनकी मर्यादा
गढ़ने को अच्छा परिवेश 
अच्छा देश ।    

 

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