Author Topic: Hindi Poetry  (Read 9959 times)

RAMAN RAI

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Re: Hindi Poetry
« Reply #10 on: March 12, 2012, 06:41:29 PM »
Tu jo sooraj chori keeta
Mera si.
Tu jis ghar vich nhera
keeta,
Mera si.
Ih jo dhup tere ghar hasse,
meri hae.
Is de baajhoN meri umar
haneri hae.
Is vich mere gham di
mehak batheri hae,
Eh dhup kal si meri, aj vi
meri hae.
MaeN hi kiran-vihoona is
da baabal haaN,
Is de angi meri agan samoi
hae,
Is vich mere sooraj di
khushboi hae,
Sikhar dupehre jis di chori
hoi hae.
Par is chori vich tera kuj vi
dosh naheeN,
Sooraj di har yug vich chori
hoi hae.
RoNdi roNdi sooraj nu har
yug aNdar,
Koi na koi sada dupehri moi
hae.
MaeN nir-loa, risham-
vichuna araz karaaN,
MaeN ik baap adharmi tere
duvaar khaRa,
Aa hatheeN ik sooraj tere
sees dharaaN,
Aa aj aapni dhup lai tere
paer phaRaaN.
MaeN kalkhaai deh, tu
maenu bakhsh daveeN,
DhupaaN saahveN muR na
mera naam laveeN.
Je koi kiran kade kujh
puCHe, chupp raveeN,
Ja maenu '   ..."kaala sooraj'
keh ke Taal daveeN.
Eh ik dhup de baabal di
arjoi hae,
Meri dhup mere lai aj toN
moi hae,
Sane sooraje teri aj toN hoi
hae,
Dhup jide ghar hasse,
baabal soi hae.
Tu jo sooraj chori keeta,
Tera si.
Mera ghar ta janam-divas
toN
Nhera si.

RAMAN RAI

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Re: Hindi Poetry
« Reply #11 on: March 17, 2012, 02:31:30 PM »
AJJKAL KE DOHE-TRULY MODERN

ARE BEE

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Re: Hindi Poetry
« Reply #12 on: March 17, 2012, 05:12:23 PM »
gud 1

KINGAHSAN

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Re: Hindi Poetry
« Reply #13 on: April 17, 2012, 09:34:28 AM »
gud and nice

SHANDAL

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Re: Hindi Poetry
« Reply #14 on: November 16, 2012, 01:11:03 PM »
करतार सिंह सराभा की यह गज़ल भगत सिंह को बेहद प्रिय थी वे इसे अपने पास हमेशा रखते थे और अकेले में अक्सर गुनगुनाया करते थे:
 "यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा, मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा; मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है, यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा; मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ, यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा; मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत! कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा; तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये, तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा."

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Re: Hindi Poetry
« Reply #15 on: November 22, 2012, 07:39:48 AM »
कभी तो आओगे लौटकर तुम, पुराने सपने हज़ार लेके
 तुम्हारे वादे पे जी रहा हूं, मैं चंद सांसें उधार लेके
 -अंजनी कुमार सुमन
 

SHANDAL

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Re: Hindi Poetry
« Reply #16 on: November 22, 2012, 07:40:41 AM »
जुनूं में जितनी भी गुज़री ब-कार गुज़री है
 अगरचे दिल पे खराबी हज़ार गुज़री है
 -फैज़ अहमद फैज़
 हज़ार बार भी वादा वफा न हो लेकिन
 मैं उनकी राह में आंखें बिछा के देख तो लूं
 -महेंद्र सिंह बेदी
 यूं तो मिलते हैं हज़ारों ही बशर मिलने को
 हर किसी से कहां मिलती है तबीयत अपनी
 -श्याम सुंदर नंदा नूर
 वैसे तो मेरे जानने वाले हज़ार थे
 लेकिन पड़ा जो वक़त, सभी ने भुला दिया
 -रूप किशोर गुप्ता

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Re: Hindi Poetry
« Reply #17 on: November 22, 2012, 07:42:28 AM »
ढूंढना
 

ज़फर आपको ढूंढ, मत ढूंढ उसको,
 वह तुझमें है जिसकी तुझे जुस्तजू है।
 -बहादुर शाह ज़फर
 मेरे दोस्तों खुदारा मेरे साथ तुम भी ढूंढो,
 वो यहीं कहीं छुपे हैं मेरे गम का रुख बदल के।
 -एहसान
 जिस शहर का दस्तूर है ईमान-फरोशी,
 उस शहर में तुम रस्मे-वफा ढूंढ रहे हो।
 -महेंद्र प्रताप चांद
 ज़िन्दगी किसलिए फिर ढूंढ रही है मुझको
 क्या नया जुर्म मेरे सर पे आ रहा है कोई।
 -सुरेश कुमार
 दूसरों के पेड़ से उम्मीद साये की न कर,
 ढूंढने पड़ते हैं सबको खुद यहां अपने शजर।
 -परविंदर शोख
 


harwindersidhu

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Re: Hindi Poetry
« Reply #18 on: November 23, 2012, 10:32:27 AM »
good

sheemar

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Re: Hindi Poetry
« Reply #19 on: November 09, 2014, 09:06:23 AM »
उड़ने दूं अपनी मादा को

नीले पंखों वाली
नीले अंबर में उड़ने वाली
नीली चिड़िया
कितना अंतर
तेरी-मेरी मां में
तू भी मादा
मैं भी मादा
जीने का ढंग
अलग-अलग।
तेरे मादा होने का दुख
कभी नहीं तेरी मां को
देख तेरा सुंदर यौवन
कभी न तेरी मां घबराई।
भयमुक्त
सदा तेरी मां करती
मुझको भय से जकड़ दिया
मेरी मां ने।
मेरे यौवन की देहरी पर
चढ़ते ही
लगा दिये मेरी मां ने
अपनी आंखों के पहरे
मेरे सोने पर सोती है
जगने से पहले जगती है
अनचाहे कितने कष्ट उठाती।
कभी-कभी मन में रोती है
मेरी मां
हर बार डरा करती थी मुझसे
बिन कहे
बहुत कुछ
कहती थी मुझसे
हर माह तकती
मेरे अंदर वाले कपड़े
मैला देख उन्हें
खुश होती
बिन कहे
बहुत कुछ कहती।
दोष नहीं मेरी मां का
उसने भी
नर मादा का भेद जिया
कैसे मन के बंधन तोड़े
कैसे मुक्त करे मुझको
वह समझ नहीं पाती खुद को।
दूर गगन में उड़ने वाली
नीली चिड़िया
मुझको भी यह बता दे
है पता नहीं कुछ मुझको
क्या मैं भी
अपनी मां जैसी बन जाऊं
या फिर
तेरी मां जैसी बन
उड़ने दूं अपनी मादा को?

-मीरा पुरवार


http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20141109a_013118005&ileft=754&itop=19&zoomRatio=1176&AN=20141109a_013118005

 

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