Author Topic: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...  (Read 9905 times)

Rajesh Dhundhara

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #10 on: November 01, 2013, 07:04:01 PM »

Rajesh Dhundhara

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #11 on: November 01, 2013, 07:05:58 PM »

Rajesh Dhundhara

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #12 on: November 01, 2013, 07:12:36 PM »

Harpal

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #13 on: November 06, 2013, 05:26:31 AM »
अब विदा लेता हूं
अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं
उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था
उस कविता में मेरे हाथों की सख्ती को मुस्कुराना था
मेरी जांघों की मछलियों ने तैरना था
और मेरी छाती के बालों की नरम शॉल में से
स्निग्धता की लपटें उठनी थीं
उस कविता में
तेरे लिए
मेरे लिए
और जिन्दगी के सभी रिश्तों के लिए बहुत कुछ होना था मेरी दोस्त
लेकिन बहुत ही बेस्वाद है
दुनिया के इस उलझे हुए नक्शे से निपटना
और यदि मैं लिख भी लेता
शगुनों से भरी वह कविता
तो उसे वैसे ही दम तोड़ देना था
तुम्हें और मुझे छाती पर बिलखते छोड़कर
मेरी दोस्त, कविता बहुत ही निसत्व हो गई है
जबकि हथियारों के नाखून बुरी तरह बढ़ आए हैं
और अब हर तरह की कविता से पहले
हथियारों के खिलाफ युद्ध करना ज़रूरी हो गया है
युद्ध में
हर चीज़ को बहुत आसानी से समझ लिया जाता है
अपना या दुश्मन का नाम लिखने की तरह
और इस स्थिति में
मेरी तरफ चुंबन के लिए बढ़े होंटों की गोलाई को
धरती के आकार की उपमा देना
या तेरी कमर के लहरने की
समुद्र के सांस लेने से तुलना करना
बड़ा मज़ाक-सा लगता था
सो मैंने ऐसा कुछ नहीं किया
तुम्हें
मेरे आंगन में मेरा बच्चा खिला सकने की तुम्हारी ख्वाहिश को
और युद्ध के समूचेपन को
एक ही कतार में खड़ा करना मेरे लिए संभव नहीं हुआ
और अब मैं विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, हम याद रखेंगे
कि दिन में लोहार की भट्टी की तरह तपने वाले
अपने गांव के टीले
रात को फूलों की तरह महक उठते हैं
और चांदनी में पगे हुई ईख के सूखे पत्तों के ढेरों पर लेट कर
स्वर्ग को गाली देना, बहुत संगीतमय होता है
हां, यह हमें याद रखना होगा क्योंकि
जब दिल की जेबों में कुछ नहीं होता
याद करना बहुत ही अच्छा लगता है
मैं इस विदाई के पल शुक्रिया करना चाहता हूं
उन सभी हसीन चीज़ों का
जो हमारे मिलन पर तंबू की तरह तनती रहीं
और उन आम जगहों का
जो हमारे मिलने से हसीन हो गई
मैं शुक्रिया करता हूं
अपने सिर पर ठहर जाने वाली
तेरी तरह हल्की और गीतों भरी हवा का
जो मेरा दिल लगाए रखती थी तेरे इंतज़ार में
रास्ते पर उगी हुई रेशमी घास का
जो तुम्हारी लरजती चाल के सामने हमेशा बिछ जाता था
टींडों से उतरी कपास का
जिसने कभी भी कोई उज़्र न किया
और हमेशा मुस्कराकर हमारे लिए सेज बन गई
गन्नों पर तैनात पिदि्दयों का
जिन्होंने आने-जाने वालों की भनक रखी
जवान हुए गेंहू की बालियों का
जो हम बैठे हुए न सही, लेटे हुए तो ढंकती रही
मैं शुक्रगुजार हूं, सरसों के नन्हें फूलों का
जिन्होंने कई बार मुझे अवसर दिया
तेरे केशों से पराग केसर झाड़ने का
मैं आदमी हूं, बहुत कुछ छोटा-छोटा जोड़कर बना हूं
और उन सभी चीज़ों के लिए
जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा
मेरे पास शुक्राना है
मैं शुक्रिया करना चाहता हूं
प्यार करना बहुत ही सहज है
जैसे कि जुल्म को झेलते हुए खुद को लड़ाई के लिए तैयार करना
या जैसे गुप्तवास में लगी गोली से
किसी गुफा में पड़े रहकर
जख्म के भरने के दिन की कोई कल्पना करे
प्यार करना
और लड़ सकना
जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है
धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूंज जाना -
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया
जिस्म का रिश्ता समझ सकना,
खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना,
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फि़दा होना,
सहम को चीरकर मिलना और विदा होना,
बड़ी शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त,
मैं अब विदा लेता हूं
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नही
जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया
ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना
सहम को चीर कर मिलना और विदा होना
बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त
मैं अब विदा होता हूं
तू भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया
कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने
कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने
तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला
तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।


अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
« Last Edit: November 06, 2013, 05:28:54 AM by Harpal »

Arvinder Sra

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #14 on: November 06, 2013, 06:23:15 AM »
I like it.....

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #15 on: November 18, 2013, 08:08:25 PM »
ਮੈਂ ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਦੀ ਹੇਠੀ ਨਹੀ ਕੀਤੀ
ਜਦ ਕਿ ਉਹ ਲੋਕ- ਜੋ ਤਾਨੂੰ ਪਲੀਤ ਕਰਿਆ ਕਰਦੇ ਹਨ
ਦਬਾਉਦੇਂ ਹਨ । ਕੁਚਲਦੇ ਹਨ ।
ਉਨਾਂ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋ ਪਹਿਲਾ ਅੰਦਰਲਾ ਮਨੱੁਖ ਕੁਚਲਣਾ ਪੈਦਾਂ ਹੈ
ਪਾਸ਼ !!

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #16 on: November 19, 2013, 08:36:05 PM »
ਬਾਪੂ ਤੂੰ ਗਮ ਨਾ ਲਾਈਂ
ਮੈਂ ਉਸ ਨੌਜਵਾਨ ਹਿੱਪੀ ਨੂੰ ਤੇਰੇ ਸਾਹਮਣੇ ਪੁੱਛਾਂਗਾਂ ਮੇਰੇ ਬਚਪਨ ਤੋਂ ਅਗਲੀ ਉਮਰ ਦੀ ਵਾਰੀ
ਦੁਆਪਰ ਯੁੱਧ ਵਾਂਗ ਅੱਗੜ-ਪਿੱਛੜ ਕਿਸ ਬਦਮਾਸ਼ ਨੇ ਕੀਤੀ ਹੈ
ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ ਦੱਸਾਗਾਂ ਨਿਸੱਤੇ ਫਤਵਿਆਂ ਨਾਲ ਚੀਜ਼ਾ ਨੂੰ ਪੁਰਾਣੇ ਕਰਦੇ ਚਲੇ ਜਾਣ
ਅਤੇ ਬੇਗਾਨਿਆ ਪੁੱਤਾਂ ਦੇ ਮਾਵਾਂ ਦੇ ਕੁਨਾਂ ਪਾਉਣੇ ਸਿਰਫ਼ ਲੋਰੀ ਦੇ ਹੀ ਸੰਗੀਤ ਵਿਚ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੁੰਦਾਂ ਹੈ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ ਕਹਾਗਾਂ ਕਿ ਮਮਤਾ ਦੀ ਲੋਰੀ ਤੋਂ ਜਰਾਂ ਬਾਹਰ ਤਾਂ ਆ
ਤੈਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗੇ
ਬਾਕੀ ਦਾ ਸਾਰਾ ਦੇਸ਼ ਬੁੱਢਾ ਨਹੀ ਹੈ
ਪਾਸ਼ !!

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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #17 on: December 04, 2013, 07:02:04 PM »
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਸਮਝੇ ਸਾਂ ਘਰ ਵਰਗੀ ਪਵਿੱਤਰ ਸ਼ੈਅ
ਜਿਦ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਹੁੱਸੜ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ
ਮਨੁੱਖ ਵਰ੍ਹਦੇ ਮੀਂਹਾਂ ਦੀ ਗੂੰਜ ਵਾਂਗ ਗਲੀਆਂ ਚ ਵਹਿੰਦਾ ਹੈ
ਕਣਕ ਦੀਆਂ ਬੱਲੀਆਂ ਦੇ ਵਾਂਗ ਖੇਤੀਂ ਝੂਮਦਾ ਹੈ
ਅਤੇ ਅਸਮਾਨ ਦੀ ਵਿਸ਼ਾਲਤਾ ਨੂੰ ਅਰਥ ਦਿੰਦਾ ਹੈ


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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #18 on: December 04, 2013, 07:02:42 PM »
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਸਮਝੇ ਸਾਂ ਜੱਫੀ ਵਰਗੇ ਇੱਕ ਅਹਿਸਾਸ ਦਾ ਨਾਂ
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਸਮਝੇ ਸਾਂ ਕੰਮ ਵਰਗਾ ਨਸ਼ਾ ਕੋਈ
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਸਮਝੇ ਸਾਂ ਕੁਰਬਾਨੀ ਜਹੀ ਵਫ਼ਾ
ਪਰ ਜੇ ਦੇਸ਼
ਰੂਹ ਦੀ ਵਗਾਰ ਦਾ ਕੋਈ ਕਾਰਖ਼ਾਨਾ ਹੈ
ਪਰ ਜੇ ਦੇਸ਼ ਉੱਲੂ ਬਣਨ ਦਾ ਪ੍ਰਯੋਗ ਘਰ ਹੈ
ਤਾਂ ਸਾਨੂੰ ਓਸ ਤੋਂ ਖ਼ਤਰਾ ਹੈ
ਜੇ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਅਮਨ ਇਹੋ ਹੁੰਦੈ
ਕਿ ਕਰਜੇ ਦੇ ਪਹਾੜਾਂ ਤੋਂ ਰਿੜ੍ਹਦਿਆਂ ਪੱਥਰਾਂ ਵਾਂਗ ਟੁੱਟਦੀ ਰਹੇ ਹੋਂਦ ਸਾਡੀ
ਕਿ ਤਨਖਾਹਾਂ ਦੇ ਮੂੰਹ ਤੇ ਥੁੱਕਦਾ ਰਹੇ
ਕੀਮਤਾਂ ਦਾ ਬੇਸ਼ਰਮ ਹਾਸਾ
ਕਿ ਆਪਣੇ ਲਹੂ ਵਿੱਚ ਨਹਾਉਣਾ ਹੀ ਤੀਰਥ ਦਾ ਪੁੰਨ ਹੋਵੇ
ਤਾਂ ਸਾਨੂੰ ਅਮਨ ਤੋਂ ਖ਼ਤਰਾ ਹੈ


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Re: ਪਾਸ਼ ਦੀ ਕਵਿਤਾ...
« Reply #19 on: December 04, 2013, 07:03:02 PM »
ਜੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਅਤਾ ਏਹੋ ਹੁੰਦੀ ਹੈ
ਕਿ ਹਰ ਹੜਤਾਲ ਨੂੰ ਫੇਹ ਕੇ ਅਮਨ ਨੂੰ ਰੰਗ ਚੜ੍ਹਨਾ ਹੈ
ਕਿ ਸੂਰਮਗਤੀ ਬੱਸ ਹੱਦਾਂ ਤੇ ਮਰ ਕੇ ਪਰਵਾਨ ਚੜ੍ਹਨੀ ਹੈ
ਕਲਾ ਦਾ ਫੁੱਲ ਬੱਸ ਰਾਜੇ ਦੀ ਖਿੜਕੀ ਵਿੱਚ ਖਿੜਨਾ ਹੈ
ਅਕਲ ਨੇ ਹੁਕਮ ਦੇ ਖੂਹੇ ਤੇ ਗਿੜ ਕੇ ਧਰਤ ਸਿੰਜਣੀ ਹੈ
ਕਿਰਤ ਨੇ ਰਾਜ ਮਹਿਲਾਂ ਦੇ ਦਰੀਂ ਖਰਕਾ ਹੀ ਬਣਨਾ ਹੈ
ਤਾਂ ਸਾਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਅਤਾ ਤੋਂ ਖ਼ਤਰਾ ਹੈ......ਪਾਸ਼

 

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ਮੇਰੇ ਦੇਸ਼ ਮਹਾਨ

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ਪੰਜਾਬੀ ਕਾਫ਼ੀਆਂ ਸਾਈਂ ਮੌਲਾ ਸ਼ਾਹ

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