Author Topic: LIKE BANTA HAI  (Read 9552 times)

PRITAM DASS

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« Reply #130 on: June 26, 2017, 05:42:54 PM »

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« Reply #131 on: June 26, 2017, 05:43:16 PM »

sheemar

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« Reply #132 on: July 10, 2017, 07:18:59 AM »

sheemar

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« Reply #133 on: July 22, 2017, 06:23:50 AM »

दोनों भाई बच्चों को हाई एजुकेशन के लिए भी अवेयर कर रहे

अमेरिका से लौटे करमन गुरसहज ने गांव रत्तोके को मॉडल गांव बनाने की मुहिम छेड़ रखी है
प्रताप सिंह/ गुरलाल लाली | तरनतारन
गांवरत्तोके के एनआरआई परिवार के दो बेटों ने छोटी उम्र में ही रत्तोके डिवेलपमेंट इनीटिव फाउंडेशन (आरडीआईएफ) बनाकर गांवों को साफ-सुथरा और मॉडल गांव बनाने की मुहिम छेड़ी है। गांव में कोई बाहर शौच के लिए जाए इसके िलए दोनों भाई पंजाब सरकार के सहयोग से 32 टायलेट बना चुके हैं। गांव में शिक्षा और सेहत सुविधाओं के लिए मुहिम चला रखी है। एनआरआई रूपा संधू ने बताया, वह परिवार सहित 25 साल से अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिका में ही जन्मे उसके दो बेटे करमन संधू (16) और गुरसहज संधू (13) जब भारत आए और अपने गांव रत्तोके पहुंचे तो हालात देख कर काफी भावुक हुए। उन्होंने आरडीआई नामक समाज सेवी संस्था बनाई। इसमें गांव के लोगों की मदद ले रहे हैं। दोनों भाइयों ने बताया, गांव में छप्पड़ के पानी को देखते हुए उन्होंने पहले खुले में शौच जाने के लिए लोगों को प्रेरित किया। इसके अलावा सरकार के सहयोग से गांव में शौचालय बनवाए गए हैं जिसका काम जल्द मुकम्मल होने वाला है। उन्होंने बताया कि वे गांव रत्तोके के अलावा पंजाब के सभी गांवों में संस्था और सरकार के सहयोग से मुहिम को आगे बढ़ाएंगे। आने वाले समय में गांव रत्तोके मॉडल गांव बनेगा। रूपा संधू और उनके बेटों ने सरकारी सेकंडरी स्कूल चोहला साहिब भाई अदली साहिब में जाकर स्टूडेंट्स को अवेयर किया। उन्होंने बच्चों को उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए कहा वहीं भरोसा दिलाया कि पढ़ाई में वे उनकी मदद भी करेंगे।
रूप संधू ने बताया, गांव को मॉडल बनाने के लिए जल्द ही सरकार और संस्था के सहयोग से सीवरेज सिस्टम प्लांट लगाया जाएगा, ताकि गांव में फैलने वाले निकासी पानी को सीवरेज प्रणाली से जोड़ा जा सके। इससे जहां गांव स्वच्छ होगा वहीं लोगों को किसी तरह की बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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« Reply #134 on: August 07, 2017, 05:56:45 PM »

PRITAM DASS

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« Reply #135 on: August 20, 2017, 10:09:15 PM »

sheemar

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« Reply #136 on: September 03, 2017, 07:06:52 AM »

पुराने जूते-चप्पलों को रिसाइकिल कर नंगे पांव स्कूल जाने वाले बच्चों को पहना रहे, तीन साल में 4 राज्यों में 50 हजार बच्चों को मिली मदद

भारत में 5% लोग हर साल 8,000 रु. से ज्यादा के जूते पहनते हैं

राजस्थान के श्रीयंस उत्तराखंड के रमेश की मुहिम, 50 शहरों में वाॅलंटियर्स कलेक्शन करते हैं

भास्कर न्यूज | मुंबई
अक्सरलोग जूते-चप्पल पुराने होने पर फेंक देते हैं। पर उदयपुर के श्रीयंस भंडारी और गढ़वाल के रमेश धामी पुराने जूते-चप्पलों को नया लुक देकर उन मासूमों को पहना रहे हैं, जो नंगे पांव स्कूल जाने को मजबूर हैं। वे बेकार पड़े जूते और चप्पलों को पहले रिसाइकिल कर चप्पल बनाते हैं, फिर स्कूल, कॉलेज, झुग्गी बस्तियों और गांवों में बच्चों को बांटते हैं। ऐसा वे पिछले तीन साल से कर रहे हैं। अब तक चार राज्यों में 50 हजार से ज्यादा बच्चों को चप्पल पहना चुके हैं। उनका लक्ष्य 2017 में इस आंकड़े को एक लाख तक पहुंचाना है। इस काम के लिए उन्होंने 'ग्रीन सोल' नाम की कंपनी भी बनाई है, जिसका हेड ऑफिस मुंबई में है। कंपनी के वॉलंटियर्स देश के 15 राज्यों के 50 बड़े शहरों में पुराने जूते-चप्पलों का कलेक्शन करने का काम कर रहे हैं।
ग्रीन सोल के को-फाउंडर श्रीयंस भंडारी ने भास्कर को बताया कि हमने 2014 में पुराने और बेकार जूते-चप्पलों को दोबारा नया लुक देकर ऑनलाइन बेचने का स्टार्टअप शुरू किया था। इसी दौरान एक दिन आइडिया आया कि क्यूं उन बच्चों को चप्पल मुहैया कराएं, जो नंगे पांव स्कूल जाते हैं। इससे केवल जरूरतमंद बच्चों की मदद होगी, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण को भी कम किया जा सकेगा। इसके लिए मैं और रमेश सबसे पहले जूते बनाने वाली फैक्ट्रियों में गए। वहां जूतों की मरम्मत का काम देखा। फिर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू में स्पोर्ट्स एकेडमी, बड़े स्कूलों, कॉलेजों, संस्थाओं और निजी कंपनियों से संपर्क कर पुराने जूते-चप्पल जुटाना शुरू किया। सबसे अधिक जूते बेंगलुरू और दिल्ली से मिलते हैं। रिसाइकिल के काम के लिए हमने 10 कर्मचारी भी रखे हैं। रिसाइकिल के दौरान हम जूते और चप्पलों के सोल को निकालकर उन्हें री-डिजाइन कर चप्पल बनाते हैं। फिलहाल, हम रिसाइकिल चप्पलों को गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और असम में जरूरतमंद बच्चों को दे रहे हैं। हर महीने औसत एक हजार चप्पल बच्चों को पहनाते हैं। इसके अलावा अब हम ऑनलाइन रिटेल बिजनेस भी शुरू कर रहे हैं। इससे होने वाली आय को भी हम जरूरतमंद बच्चों को चप्पल मुहैया कराने में लगाएंगे। यही नहीं, हमने कुछ सेलिब्रिटी से बात की है, उनके जूतों का ऑक्शन कर मिलने वाले पैसे से चप्पल बनाएंगे। इस काम में कई कार्पोरेट कंपनियां हमारी मदद कर रही हैं। देश के करीब 80% हिस्सों में लोग हमारे वॉलंटिंयर्स को पुराने जूते-चप्पल खुद ही भेजते हैं।
स्कूल में बच्चों को चप्पल पहनाते श्रीयंस
दुनिया में करीब 35 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिनके पास जूते-चप्पल नहीं हैं। जबकि हर साल करीब 35 करोड़ स्पोर्ट्स शूज फेंके जाते हैं। चप्पल नहीं पहनने से हर साल करीब 20 लाख लोगों को सॉइल ट्रांसमिटेड बीमारी होती है। वहीं, करीब 56% भारतीय, साल में 1,000 रु. से कम रु. चप्पल पर खर्च करते हैं। 26% लोग 1,000-8,000 रु और 5% लोग 8,000 से ज्यादा रुपए जूते-चप्पल पर खर्च करते हैं।

 

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