Author Topic: Char Dham  (Read 3652 times)

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Char Dham
« on: May 14, 2015, 04:10:44 PM »
Char Dham (literally: 'the four abodes/seats') are the names of four pilgrimage sites in India that are widely revered by Hindus. It comprises Badrinath, Dwarka, Puri and Rameswaram. It is considered highly sacred by Hindus to visit Char Dham during one's lifetime. The Char Dham defined by Adi Shankaracharya consists of three Vaishnavite and one Shaivite pilgrimages.[1][2]

The other pilgrimages sites in the Indian state of Uttarakhand viz. Yamunotri, Gangotri, Kedarnath, and Badrinath. were known as Chota Char Dham to differentiate them from the bigger circuit of Char Dham sites, but after the mid-20th century they have been also referred to as the Char Dham


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Re: Char Dham
« Reply #1 on: May 14, 2015, 04:11:41 PM »
The front view of the Rameswaram temple in an early morning.
« Last Edit: May 14, 2015, 04:12:54 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #2 on: May 14, 2015, 04:13:28 PM »
The Dwarakadheesh temple (Dwarakadhish temple/Dwarkadhish temple)at Dwarka, Gujarat, India
« Last Edit: May 14, 2015, 04:14:32 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #3 on: May 14, 2015, 04:15:10 PM »
Temple-Jagannath
« Last Edit: May 14, 2015, 04:16:12 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #4 on: May 15, 2015, 02:57:22 PM »
इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद कैसे बचे केदारनाथ वपशुपतिनाथ मंदिर -

रुड़की। चाहे जून 2013 की केदारनाथ त्रासदी हो या फिर 25 अप्रैल को नेपाल में आया शक्तिशाली भूकंप। दोनों दैवीय आपदा ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। इन दोनों जगहों पर भयंकर त्रासदी के बाद भी उत्तराखंड में बाबा केदारनाथ का मंदिर और नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को क्षति न पहुंचने की बात ने आम लोगों को हैरत में डाल दिया। वैज्ञानिकों की मानें तो इस पर अभी विस्तृत मंथन तो नहीं किया है, लेकिन कारीगरों के ज्ञान और अनुभव से इन धार्मिक स्थलों के सुरक्षित रहने की बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। सदियों से उत्तराखंड में भूकंप, जल प्रलय सहित अन्य आपदाएं आती रही हैं। अधिकांश धार्मिक स्थलों को भीषण आपदाओं में भी कोई क्षति नहीं पहुंची है। इससे आम लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिक भी असमंजस में हैं। जहां आम लोग इसको चमत्कार का नाम देते हैं, वहीं विशेषज्ञ और वैज्ञानिक इसे पुराने कारीगरों के परंपरागत ज्ञान, अनुभव, डिजाइन के साथ इनके निर्माण में प्रयोग होने वाली उच्च गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल करना इसकी वजह मानते हैं। आइआइटी रुड़की भूकंप अभियांत्रिकी विभाग के डॉ. डीके पॉल के अनुसार ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों का निर्माण हजारों साल पहले किया है। पुराने जमाने में तकनीक विकसित नहीं थी। ऐसे में कारीगर अपने ज्ञान, अनुभव और उस स्थान की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही निर्माण कार्य करते थे। उनके अनुसार अधिकांश ऐतिहासिक मंदिरों का निर्माण पत्थरों से किया है। इनकी दीवार 40-60 सेंटीमीटर मोटी होती है। उनके अनुसार केदारनाथ मंदिर के निर्माण में भी पत्थरों का प्रयोग किया है। वैसे ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि जिससे मंदिर के निर्माण के बारे में पूरी जानकारी हासिल की जा सके। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के स्ट्रक्चर इंजीनियरिंग ग्रुप के लीडर एवं वैज्ञानिक डॉ. अचल मित्तल के अनुसार केदारनाथ मंदिर स्टोन मैसनरी स्ट्रक्चर का बना है, जबकि पशुपतिनाथ मंदिर पगोड़ा स्ट्रक्चर का बनाया है। जापान और चीन में भी पगोड़ा स्ट्रक्चर के मंदिर हैं। पत्थरों से बने निर्माण की उम्र ज्यादा होती है। उनके अनुसार पुराने समय में कारीगर जियोमैटिक डिजाइन मैथड का इस्तेमाल करते थे। इसके तहत वह आपदाओं का निर्माण पर क्या असर पड़ेगा, इसका पता लगाने के लिए छोटे-छोटे निर्माण करते थे। उस अनुभव के बाद ही बड़े निर्माण किए जाते थे। उनके अनुसार किसी निर्माण को मजबूत बनाने में उच्च गुणवत्ता की सामग्री के अलावा कारीगरों की वर्क मैन शिप भी काफी महत्व रखती है। उनका मानना है कि आपदा और भूकंप के बाद भी धार्मिक स्थलों का सही सलामत रहना उसके डिजाइन, कारीगरों की मेहनत और उच्च गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल करना है। सीबीआरआइ के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अजय चौरसिया के अनुसार वह भी इस बात को लेकर हैरत में हैं कि नेपाल में शक्तिशाली भूकंप के बावजूद पशुपतिनाथ मंदिर के आसपास के निर्माण को तो नुकसान पहुंचा है, लेकिन मंदिर को कोई भी क्षति नहीं हुई है। उनके अनुसार इसे चमत्कार कहना उचित नहीं होगा, बल्कि कारीगरों का परंपरागत ज्ञान, अनुभव ही इसकी वजह है। उनके अनुसार भूकंप और दैवीय आपदाएं सदियों से आ रही हैं। उससे अनुभव लेकर ही कारीगरों ने इनका निर्माण किया होगा। जिस कारण वर्तमान में भी यह यह धार्मिक स्थलों बड़ी आपदाओं और जबरदस्त भूकंपों को भी सहन करने की शक्ति रखते हैं।
« Last Edit: May 15, 2015, 02:59:58 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #5 on: May 15, 2015, 03:10:32 PM »
बद्रीविशाल के दर्शन मतलब बैकुंठ के दर्शन

बद्रीनाथ नर-नारायण पर्वत के मध्य स्थित बद्रीनाथ को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। मान्यता है कि गंगाजी तीव्र वेग को संतुलित करने के लिए बारह पवित्र धाराओं में बंट गईं। इन्हीं में एक है अलकनंदा, जिसके तट पर बद्रिकाश्रम स्थित है। चमोली जनपद में स्थित इस मंदिर का निर्माण आठवीं सदी में आद्य गुरु शंकराचार्य ने करवाया। भगवान विष्णु को समर्पित यह स्थल आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित गया था। देश की एकता और अखण्डता तथा हिन्दु धर्म के पुर्नस्थापना करने के लिए शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार तीर्थस्थल स्थापित किए गए-उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी। यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप। मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। मुख्य मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की काले पाषाण की शीर्ष भाग मूर्ति है। जिसके दाहिने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है। आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा यहां एक मठ की भी स्थापना की गई थी। अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिए खुला रहता है। यहां पर 130 डिग्री सैल्सियस पर खौलता एक तप्त कुंड और सूर्य कुण्ड है जहां पूजा से पूर्व स्नान आवश्यक समझा जाता है।
« Last Edit: May 15, 2015, 03:11:54 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #6 on: May 15, 2015, 03:17:31 PM »
गंगोत्री में मां गंगा के दर्शन

पौराणिक कथा है कि देवी गंगा ने राजा भगीरथ के पुरखों को पापों से तारने के लिए नदी का रूप धारण किया था। भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न हो गंगाजी धरती पर अवतरित हुई, इसीलिए उनका भागीरथी नाम भी है। गंगोत्री धाम में इन्हीं मां गंगा की पूजा होती है, जो कि समुद्रतल से 3140 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित है।
« Last Edit: May 15, 2015, 03:18:43 PM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #7 on: May 16, 2015, 07:43:42 AM »
Yamunotri (Hindi: यमुनोत्री) is the source of the Yamuna River and the seat of the Goddess Yamuna in Hinduism.
It is situated at an altitude of 3,293 metres (10,804 ft) in the Garhwal Himalayas and located approximately 30 kilometers (19 mi) North of Uttarkashi, the headquarters of the Uttarkashi district in the Garhwal Division of Uttarakhand, India. It is one of the four sites in India's Chhota Char Dham pilgrimage. The sacred shrine of Yamunotri, source of the river Yamuna, is the westernmost shrine in the Garhwal Himalayas, perched atop a flank of Bandar Poonch Parvat. The chief attraction at Yamunotri is the temple devoted to the Goddess Yamuna and the holy thermal springs at Janki Chatti (7 km. Away).
« Last Edit: May 16, 2015, 07:45:10 AM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #8 on: May 16, 2015, 07:46:44 AM »
Close to the temple are hot water springs gushing out from the mountain cavities. Surya Kund is the most important kund.
Near the Surya Kund there is a shila called Divya Shila, which is worshipped before puja is offered to the deity. Devotees prepare rice and potatoes, tied in muslin cloth, to offer at the shrine by dipping them in these hot water springs. Rice so cooked is taken back home as prasadam. The pujaris of Yamunotri come from the village of Kharsali near Janki Chatti. They are the administrators of the sacred place and perform religious rites. They are well-versed in the Shastras.
« Last Edit: May 16, 2015, 07:48:24 AM by SHANDAL »

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Re: Char Dham
« Reply #9 on: May 16, 2015, 07:50:34 AM »
The temple compound at Yamunotri, source of Yamuna River in Uttaranchal, India
« Last Edit: May 16, 2015, 07:52:11 AM by SHANDAL »

 

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